पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज


ऋषिकेश : परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने विश्व अभिभावक दिवस के अवसर पर दुनिया भर के सभी माता-पिता द्वारा की जा रही सेवा और परिश्रम की सराहना करते हुये कहा कि माता-पिता बच्चों का पालन-पोषण कर उन्हें सुरक्षा और संस्कार देकर सुखद भविष्य के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान प्रदान करते हैं। 

पूज्य स्वामी जी ने कहा कि अभिभावकों द्वारा किये जा रहे आजीवन बलिदान, प्रेम, त्याग और सामंजस्यपूर्ण पारिवारिक माहौल से ही संस्कार युक्त पीढ़ी का निर्माण होता है, जो न केवल परिवार या राष्ट्र बल्कि वैश्विक स्तर पर अद्भुत परिवर्तन कर सकते हैं। परिवारिक संस्कारों से ही समाज की नींव मजबूत होती है।

कोविड-19 महामारी के कारण अभिभावकों को अतिरिक्त जिम्मेदारियों का सामना करना पड़ रहा है। कई लोग बेरोजगार हो गये है, बच्चों की देखभाल के साथ शिक्षा और सुरक्षा की जिम्मेदारी और भी बढ़ गयी हैं तथा  महामारी से उत्पन्न तनाव से बच्चों को मुक्त रखना जैसी अनेक चुनौतियों का सामना इस समय कई माता-पिता कर रहे हैं। परिस्थितियां कैसी भी हो परन्तु माता-पिता हमेशा अपने बच्चों के साथ खड़े रहते हैं और बच्चों की जीवन यात्रा को सफल बनाने में निःस्वार्थ परिश्रम करते हैं। 

पूज्य स्वामी जी ने कहा कि प्रत्येक माता-पिता समर्पण और त्याग कर अपने बच्चों को सफलता की बुलंदियों पर पहुंचाने हेतु प्रयत्नशील रहते हैं अतः बच्चोेें की भी जिम्मेदारी और कर्तव्य बनता है कि माता-पिता का सम्मान करें और उनका दिल कभी न दुखायें क्योंकि इस दुनिया में माता-पिता से अधिक बच्चों को कोई और प्यार नहीं दे सकता।

पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने कहा कि धरती पर माता-पिता प्रत्यक्ष देवता हैं। हमारी गौरवशाली संस्कृति में धरती माता तथा माता-पिता को भगवान के समान माना गया हैं, वे हमें प्रसन्न और स्वस्थ रखने के लिए स्वयं संघर्ष करते हैं; हमें सर्वश्रेष्ठ देने के लिए कड़ी मेहनत करते हैं; बच्चों को भोजन और शिक्षा प्रदान करने के लिए अपने सुखों का त्याग करते हैं, इसलिए उनके बलिदान को हमेशा याद रखें। जिस प्रेम और त्याग के साथ माता-पिता बच्चों की परवरिश करते हैं वही प्रेम, त्याग और सेवाभावना लिये अपने अभिभावकों के साथ उनके बुढ़ापेेे में उनके पास रहें तथा सहस्राब्दियों से मानव को जीवन देने वाली पृथ्वी माता के साथ मानवता पूर्ण व्यवहार करें तथा उसका शोषण नहीं पोषण करें; दोहन नहीं संवर्द्धन करें।



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